शादियों का सिलसिला आखिरकार थम गया।
आज शाम घर में कोई काम का दबाव नहीं था।
बच्चों को उनके पापा के पास छोड़कर मैं अकेले निकल गई।
कॉलोनी के बाहर वाली सड़क पर बस चुपचाप चलती रही, कहीं जाना नहीं था।
किसी के घर से हल्के गाने की आवाज़ आ रही थी, हवा में थोड़ी ठंडक भी थी।
काफी दिनों बाद लगा जैसे यह वक़्त (सिर्फ़ अपने लिए) मिला हो।
रास्ते में वही रोज़ वाले अंकल मिल गए, बेंच पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे।
बस मुस्कुरा के हाथ हिला दिया, बात कुछ खास नहीं हुई।

घर लौटी तो बच्चे टीवी के सामने लड़ रहे थे कि रिमोट किसका है।

फिर भी मन हल्का-हल्का सा रहा, पता नहीं क्यों।
