काम ऐसा है कि कभी दिन-रात फुर्सत नहीं मिलती, कभी पूरा दिन खाली निकल जाता है।
खाली दिनों में सोचती हूं आज कुछ शुरू करूंगी, फिर वही सुस्ती हावी हो जाती है।
घर का हिसाब-किताब 2 बारा लिखना शुरू किया तो लगा शायद शरीर के लिए भी वही तरीका काम आए।
पर ब्रेड बनाने में थोड़ी देर खड़े रहना पड़े तो पैर जवाब देने लगते हैं, ताकत नाम की चीज़ बची ही नहीं लगती।
फ्रीलांस का समय कभी तय नहीं रहता, किसी ने कोई ऐसा तरीका अपनाया हो जिसमें रोज़ का पक्का समय ना चाहिए हो?
