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टहलते-टहलते सुकून

कुछ समय से मन को समझने और सँभालने का तरीका सीखने की कोशिश में हूँ, इसी वजह से यहाँ आई हूँ। रात को सोने से पहले डायरी में उस दिन के बारे में थोड़ा लिख लेती हूँ, और जब बेचैनी बढ़ने लगती है तो घर के आसपास थोड़ी देर टहल आती हूँ। शुरुआत में अजीब सा लगा था, अब धीरे-धीरे आदत जैसी बनती जा रही है। पूरी तरह हल्का महसूस नहीं होता, पर पहले से थोड़ा शांत ज़रूर लगता है।

कमेंट 4

  • गुनगुन09.29

    शाम को टहलना सच में मन को हल्का कर देता है। मैं दिन भर दुकान में बैठा रहता हूँ, तो शरीर भी अकड़ जाता है और मन भी बेचैन रहता है। कुछ महीने पहले से मैं भी रात को 20 मिनट टहलने लगा हूँ, पूरी तरह ठीक नहीं होता पर नींद थोड़ी बेहतर आती है। डायरी वाली आदत अच्छी है, मैंने भी हिसाब की किताब लिखना फिर से शुरू की है, उससे भी मन शांत रहता है। आप सबका क्या अनुभव है जी?

  • चाँदनी रात09.29

    रात को डायरी में लिखना और बेचैनी पर टहल आना, ये तरीका मुझे भी जाना-पहचाना लगा जी! पूरी तरह हल्का नहीं लगता, पर पहले से थोडा सुकून जरूर मिलता है।

  • खुशबू09.29

    लिखने के लिए शुक्रिया जी

  • मुस्कान10.16

    लिखना भी बहुत सुकून देता है

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