काम के बीच जब क्लाइंट की कॉल आती है, उसी समय अब हल्की कसरत भी कर लेती हूँ।
ताकत बिल्कुल नहीं बची थी, तो बड़ा कुछ शुरू करने की हिम्मत नहीं हो रही थी, इसलिए कॉल के समय को ही निशान बना लिया।
काम ज़्यादा हो तो दिन भर बैठे रहने का पता ही नहीं चलता, और काम कम हो तो बिल्कुल हिलने का मन नहीं करता, दोनों ही हालत में शरीर सुस्त रह जाता था।
– बात करते हुए खड़े होकर एड़ियाँ ऊपर-नीचे करना
– फोन कान से लगाए दीवार के सहारे थोड़ी देर टिककर खड़ी रहना
– लंबी कॉल हो तो कमरे में हल्के-हल्के टहलना
– कॉल खत्म होते ही गहरी साँस लेकर बैठ जाना
पहले सोचती थी अलग से समय निकालना पड़ेगा, तभी कसरत हो पाएगी, पर काम रुक-रुक कर आता है तो अलग से समय बना ही नहीं पाती थी।
कॉल तो वैसे भी दिन में कई बार आती हैं, तो अब वही समय काम आ रहा है।
रोटी सेंकते वक्त भी यही तरीका आज़मा के देखूंगी, अभी तो बस कॉल वाला हिस्सा टिका है।

