चाय बनने का इंतज़ार करते-करते बस थोड़ा टहलना शुरू किया, कुछ खास सोचकर नहीं, बस केतली की सीटी बजने तक यूँ ही खड़े रहना अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए।
काम कम होता है तो घर में इधर-उधर घूम लेती हूँ, काम ज़्यादा होता है तो उतना टाइम भी नहीं मिलता, तो जब भी चाय या कॉफ़ी बनानी होती है वो थोड़ा-सा वक़्त पकड़ लेती हूँ।
शुरू में तो बस थोड़े कदम ही चली, फिर धीरे-धीरे रसोई से बालकनी तक जाने लगी।
पैरों में ताकत अभी भी कम है, लेकिन खड़े रहना अब पहले से थोड़ा आसान लगता है।
मतलब कुछ बड़ा नहीं किया, बस केतली को बहाना बना लिया।
साथियो, आप लोग भी काम के बीच में ऐसे छोटे-छोटे तरीके निकालते हैं क्या…
जिस दिन बिलकुल मन नहीं करता, उस दिन क्या करती हैं आप लोग, वो भी जानना चाहती हूँ।
लंबा लिख दिया, माफ़ करें।
