रसोई में आटा गूंधते समय हल्का सा खड़े रहना शुरू किया था, वो अब भी वैसा ही है।
काम ज़्यादा हो तो दिन में बस 5 मिनट, कुर्सी पकड़कर खड़े होना भर हो पाता है।
काम कम रहे तो थोड़ा ज़्यादा – ओवन के पास चहलकदमी, 10 बार उठक-बैठक, बस इतना ही।
हिसाब की कॉपी में इन दिनों को भी लिख रही हूँ, तो देख पा रही हूँ कि 2 महीने से आंकड़ा लगभग वही है, न बढ़ा न घटा।
freelance का काम कभी बिल्कुल नहीं होता, उन दिनों सोचती हूँ कि थोड़ा ज़्यादा कर लूं, पर फिर डर लगता है कि ज़्यादा करने से शरीर पर उल्टा असर न हो जाए।
रोटी सेकते हुए भी यही सोचती रहती हूँ कि कब तक इतने से काम चलेगा।
जिन्होंने ऐसे ही छोटे से शुरू किया था, आप लोगों ने कैसे तय किया कि अब थोड़ा और बढ़ाया जाए? दिन गिनकर बढ़ाया या शरीर के हिसाब से?
