Freelance का काम कभी बहुत आता है कभी बिल्कुल नहीं, ये तो चलता ही रहता है।
जब काम नहीं होता तो सोचती थी अब exercise शुरू कर दूंगी, पर ताकत इतनी कम थी कि पता ही नहीं चलता था कहाँ से शुरू करूं।
जिम जाने का मन नहीं बना, गद्दे पर लेटकर करने वाले exercise भी बीच में ही छोड़ देती थी।
फिर किचन की पानी की बोतल उठाकर देखी, वही जो रोज भरकर रखती हूं।
काम के बीच जब भी screen से नज़र हटानी होती है, बोतल पकड़कर हाथ धीरे-धीरे ऊपर नीचे करती हूं, बस थोड़ी देर के लिए।
रोटी सिकने के लिए oven का timer भी लगा रहता है, वो बजते ही यही करती हूं, टाइमर याद दिला देता है वरना भूल ही जाती।
मतलब कोई count नहीं रखती, जितना हो जाए उतना, हाथ थक जाए तो रुक जाती हूं।
पहले हफ्ते में हाथ बहुत जल्दी थक जाते थे, अब उतना नहीं थकते… बस इतना ही फर्क समझ आया है अभी तक।
हिसाब की कॉपी लिखते वक्त भी बीच में उठकर एक राउंड कर लेती हूं, टूटा-फूटा ही सही, रोज़ थोड़ा हो जाता है।
लंबा लिख दिया, बस लगा शायद किसी और के काम आ जाए।
