कल से एक छोटी बात आज़मा रही हूँ, कुर्सी से उठते वक्त हाथ का सहारा नहीं लेती, बस पैरों के बल उठती हूँ।
शुरू में मतलब बहुत अजीब लगा, ताकत जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं, थोड़ी देर में पैर कांपने लगे। क्या सबको शुरुआत में ऐसा ही लगता है।

ओवन में रोटी सिकते वक्त टाइमर बजता है तो उठकर देखना पड़ता ही है, सोचा वहीं से शुरुआत कर लूं।
काम का कोई तय समय नहीं रहता मेरा, कभी क्लाइंट का काम बहुत आ जाता है, कभी दिनों तक कुछ नहीं होता, इसलिए जो भी मौका मिले वहीं कर लेती हूँ।
हिसाब की कॉपी में भी बस निशान लगा देती हूँ, हुआ या नहीं हुआ, इससे ज़्यादा कुछ नहीं लिखती।
साथियों, इतनी छोटी चीज़ से भी फर्क पड़ता है क्या, या और कुछ जोड़ना चाहिए, बताइएगा ज़रा। लंबी पोस्ट के लिए माफ़ करना।
