काम में बिल्कुल ताकत नहीं बची थी, समझ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से करूं.
बाहर जिम जाने की हिम्मत नहीं थी, तो घर के रोज़ के काम में ही कुछ जोड़ने की सोची.
डबल रोटी का आटा अब हाथ से गूंधने लगी, मिक्सर बंद करके. पहले दिन कलाई ही दुखने लगी, इतनी कमज़ोरी थी शरीर में.
फ्रीलांस का काम ज़्यादा हो तो समय नहीं मिलता, पर काम कम वाले दिनों में यही आटा गूंधना तय काम बन गया.
हिसाब की कॉपी फिर से शुरू की है, उसमें आटा गूंधने वाले दिन भी लिख रही हूं.
धीरे-धीरे हाथ में पहले से थोड़ी जान आई है, कलाई अब उतनी जल्दी नहीं थकती.
बड़ा कुछ नहीं किया, मतलब बस रोज़ की रोटी को ही थोड़ा काम में बदल लिया.
साथियों, लंबा लिख दिया, माफ़ करना.
