रात को बुनाई की टोकरी के पास ही हिसाब की कॉपी रख दी है, कल से।
जब से काम में उतार-चढ़ाव ज़्यादा हुआ है, हिसाब लिखना बीच हफ्ते में छूट ही जाता था। सोमवार को लिख के रखा, फिर बुधवार गुज़र गया याद ही नहीं आया, फिर शनिवार को इकट्ठा सब भरने बैठी तो आधा भूल चुकी थी पैसे कहाँ गए। कभी काम इतना आ जाता है कि सांस लेने की फुर्सत नहीं रहती, तो डायरी सबसे पहले छूटती है। ये तीसरी बार हुआ तो लगा तरीका बदलना पड़ेगा।
तो जो किया वो ये था – हिसाब की कॉपी अलग दराज़ में नहीं, बनाई की टोकरी के ठीक बगल में रख दी। रात को बुनाई के लिए बैठना तो वैसे भी रोज़ का है, काम रहे या न रहे, वो नहीं छूटता। तो अब सुई उठाने से पहले एक मिनट कॉपी भी खोल लेती हूं।
फ़र्क ये पड़ा –
· लिखना अलग टास्क जैसा नहीं लगा, बुनाई के साथ ही हो गया
· भूलने का मौका कम हुआ, क्योंकि बुनाई तो भूलती नहीं
· 10 दिन में से 8 दिन लिख पाई, बाकी दिन भी अगली सुबह याद रहा
पति ने कल देखा तो बोले, “अरे ये तो ठीक तरीका निकाला!” मुझे भी लगा कि अलग से याद रखने की कोशिश करने से बेहतर है ‘पुरानी आदत के साथ ही जोड़ देना’।
अभी थोड़े ही दिन हुए हैं इस तरीके को, आगे कैसा चलता है देखना बाकी है, पर फ़िलहाल तो कॉपी टोकरी के पास ही पड़ी है और रोज़ खुल भी रही है।
