दुकान पर पूरा दिन कुर्सी पर बैठे रहना पड़ता है। हिसाब लिखते-लिखते, ग्राहक को सामान देते-देते घंटों निकल जाते हैं। कुछ समय से पीठ और कंधे बहुत अकड़ने लगे थे, कमर भी झुकी-झुकी सी रहती। सोचा कुछ तो करना पड़ेगा वरना हालत और बिगड़ेगी।
तो जो किया वो ये था — गल्ले पर बैठे-बैठे हर घंटे टाइमर लगाकर कंधे घुमाना शुरू किया। बस उठकर कंधे पीछे की तरफ घुमाना, गर्दन इधर-उधर करना। ग्राहक ना हो तो पैर भी सीधे कर लेती हूं, कुर्सी से उठकर थोड़ा दुकान के अंदर ही टहल लेती हूं।
रोटी सेकते वक्त भी आटा गूंधते हुए उंगलियां और कलाई हिलाती रहती हूं, ओवन में जब सिक रहा हो तब वहीं खड़े होकर पीठ सीधी करके थोड़ी देर रुकती हूं। पहले लगा था कि यह फालतू काम है, पर अब लगता है इसी से थोड़ा फर्क पड़ा है। कंधे अब उतने नहीं अकड़ते जितना पहले अकड़ते थे।
हिसाब की कॉपी फिर से लिखनी शुरू की तो एक कोने में कसरत वाला दिन भी लिख देती हूं, बस टिक लगा देती हूं। देखने से पता चल जाता है कब-कब छूट गया। दुकान अकेले संभालनी है तो पूरे दिन उठना-बैठना बहुत नहीं हो पाता, पर जितना हो पाता है उतना अभी ठीक ही लग रहा है।
