कल रात नौकरी के फॉर्म भरते-भरते कंधे बिल्कुल जाम हो गए थे। सोचा, ताकत तो नहीं है, अब शुरू कहाँ से करूं? फिर तय किया कि इंटरव्यू कॉल का इंतज़ार करते समय ही कुछ करूंगी। फोन में हर घंटे टाइमर बजता है तो उठकर सिर्फ हल्का स्ट्रेच करती हूं, ज्यादा कुछ नहीं। सुबह 9 बजे से शुरू करके शाम तक कई बार हो जाता है। शुरू के कुछ दिन तो बस उठना ही मुश्किल था, प्लैंक तो दूर की बात है। अब थोड़ा फर्क लगता है, कंधे उतने टाइट नहीं रहते। बीच-बीच में स्केचबुक भी खोल लेती हूं, हाथ की जकड़न उससे भी कुछ कम होती है। इंटरव्यू का रिजल्ट अभी नहीं आया, पर कम से कम बदन इतना भारी नहीं लगता।

