दिन भर रिज़्यूमे और कवर लेटर बनाते-बनाते बैठे रहना पड़ता था, शरीर में हरकत नाम की कोई चीज़ नहीं बचती थी। कहाँ से शुरू करूं, कुछ समझ नहीं आता था।
जिम जाने का मन तो बनता ही नहीं, तो कुछ छोटा ढूंढना शुरू किया। किताब पढ़ने की आदत पहले से थी, उसी के साथ जोड़ दिया — हर 20 पन्ने के बाद कुर्सी से उठकर हाथ-पैर सीधे करना।
पहले 2-3 दिन भूल ही जाती थी, बीच में उठना अजीब भी लगता था। फिर किताब में एक क्लिप रख दी, वहां तक पढ़ते ही याद आ जाता।
आज 9वां दिन है, कंधे की अकड़न पहले से कम लगती है। स्केच बनाते समय भी हाथ अब उतनी जल्दी नहीं थकता, पहले 5 मिनट में ही दर्द होने लगता था।
बड़ी कसरत सोचकर टालने से अच्छा है, ऐसे छोटे-छोटे काम रोज़ करते रहना।
