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[किया] दुकान पर किताब पढ़ने का तरीका निकाला

दुकान पर अकेले रहने से टाइम कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता जी। इस साल किताबें पढ़ने का मन बनाया था, पर शाम को बुनाई के बाद उंगलियां और आंखें दोनों थकी रहती हैं तो किताब हाथ में टिकती ही नहीं थी।

तो दुकान के टाइम में ही थोड़ा-थोड़ा पढ़ने लगी –
– काउंटर के नीचे एक किताब रखी, ग्राहक न हो तो एक-दो पन्ने पढ़ लेती हूं
– छोटे अध्याय वाली किताब चुनी, लंबे अध्याय में बीच में ग्राहक आ जाए तो धागा छूट जाता था
– पन्ने के बीच में एक कागज़ का टुकड़ा रख देती हूं, कहां रुकी थी भूलने का डर नहीं रहता

पहले लगा था कि बार-बार टूटने से कुछ समझ नहीं आएगा, पर उल्टा हुआ। कम समय मिलने की वजह से जितना पढ़ती हूं उतने पर ध्यान ज़्यादा टिकता है।

हाथ की बात करूं तो बुनाई के बाद उंगलियां और कलाई भारी-सी रहती थीं, किताब पकड़ने में वो मेहनत नहीं लगती तो हाथों को भी थोड़ा आराम मिल जाता है। शाम को लंबा टाइम निकालने की कोशिश छोड़ कर दिन के छोटे-छोटे हिस्सों में पढ़ना बांट दिया, यही काम आ गया अभी तक।

कमेंट 1

  • खुशबू10.14

    मैं भी बच्चों के सोने के बाद थोड़ी पढ़ती हूं, (छोटे अध्याय वाली) किताबें मुझे भी ठीक लगती हैं

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