रोटी का आटा गूंधने के बाद जब वो फूलने के लिए रखा रहता है, वो थोड़ी देर बस ऐसे ही निकल जाती थी।
रसोई में खड़े-खड़े सोचा कि इतनी देर में कुछ और भी तो किया जा सकता है, तो पंजों पर खड़ा होना शुरू किया।
ओटे पर हाथ टिका लिए, धीरे से एड़ी ऊँची करके खड़ी होती, फिर नीचे। बीच में पिंडलियों में खिंचाव सा महसूस होता है, साँस भी थोड़ी तेज़ हो जाती।
हिसाब की कॉपी में ये भी लिख दिया, ताकि कब से शुरू किया याद रहे। काम ज़्यादा हो तो दिन भर कुर्सी पर ही बीत जाता है, तो आटा फूलने का यही टाइम अभी तक का सबसे ठीक वक़्त लग रहा है।
रोज़ नहीं हो पाता, कभी आटा जल्दी फूल जाता है तो बस इतना ही हो पाता है। जितना भी हो जाए, उतना अच्छा लगता है।
