रात को सारे डिब्बे एक साथ देख कर घबराहट होती थी, इसलिए अब हर डिब्बे पर बस एक दिन की तारीख़ लिख देती हूँ।
पहले सोचा था पूरा कमरा एक ही बार में पैक कर लूंगी, पर वो मन पर बोझ जैसा लगने लगा था।
अब रात को हिसाब की कॉपी में लिख देती हूँ कि कौन सा कोना अगले दिन पैक करना है। सुबह उठ कर सिर्फ़ वही एक डिब्बा उठाती हूँ, बाकी डिब्बों की तरफ़ देखती भी नहीं।
बुनाई की टोकरी वाला डिब्बा सबसे आख़िर में रखा है, ताकि शाम को हाथ खाली न रहें।
काम धीरे हो रहा है, तेज़ नहीं। पर रात को कॉपी में निशान लगा कर देखती हूँ कि आज का हिस्सा पूरा हुआ, और बस इतना ही देख कर मन हल्का हो जाता है!
कॉलेज की पढ़ाई और पार्ट टाइम ड्यूटी के बीच भी यही तरीका चल रहा है, क्यों कि एक बार में सिर्फ़ एक ही डिब्बे के बारे में सोचना पड़ता है।
