
गल्ले पर बैठे-बैठे हिसाब की कॉपी में सिर झुकाकर लिखने से गर्दन और कमर दोनों में भारीपन रहता था। दुकान का गल्ला नीचा है और कॉपी एकदम सीधी समतल रखी रहती थी, तो देर तक झुकना पड़ता था।
पीछे रखी एक पुरानी लकड़ी की तख्ती उठाई और उसे हल्के कोण पर टिकाकर कॉपी उस पर रख ली। अब लिखते समय गर्दन सीधी रहती है, बस नज़र थोड़ी नीचे जाती है। कमर भी पहले जितना झुकानी नहीं पड़ती।
घर पर हिसाब की पुरानी डायरी फिर से शुरू की थी, वहाँ भी यही तरीका अपनाया। रोटी सेंकते बीच के खाली समय में बैठकर लिखना होता है, तो वही तख्ती वहाँ भी काम आई।
कॉपी थोड़ी फिसलती है अगर कोण ज़्यादा रख दो, तो नीचे एक पुराना कपड़ा बिछा दिया ताकि फिसले नहीं। अब तक ठीक चल रहा है, गर्दन का भारीपन पहले से कम लगता है।
