शाम को दुकान बंद करने के बाद जो हिसाब की किताब निकलती है, उसमें बैठने से कमर में जो अकड़न होती थी, उसके लिए एक तरीका अपनाया।
कुर्सी के पीछे सीधा लोहे का डंडा है, पीठ उससे टिकती नहीं, थोड़ा गैप रह जाता है। पुरानी चादर को चार तह में मोड़कर उस गैप में रख दिया। कमर की हड्डी वाली जगह ठीक उस मुड़े कपड़े पर आ जाए, ऐसे ऊंचाई देखकर रखा।
साथ में एक बात और की – पैर के नीचे लकड़ी का छोटा पीढ़ा रखा, जिससे घुटने कुर्सी की सीट से थोड़े ऊपर रहें। पहले पैर लटके रहते थे, उससे भी कमर पर ज़ोर पड़ता था शायद।

12 दिन से यही कर रही हूं। पहले जैसा भारीपन कम लग रहा है, पूरा ठीक नहीं हुआ है अभी तक। कपड़ा हर दो-3 दिन में निकालकर फिर से मोड़ना पड़ता है, नहीं तो एक तरफ से दब जाता है और टेढ़ा हो जाता है।
महंगा तकिया खरीदने से पहले घर में जो चादर पड़ी थी वही इस्तेमाल कर ली, काम चल रहा है जी।
